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Showing posts from December, 2020

ऐ वतन, ऐ वतन, हमको तेरी क़सम,तेरी राहों में जाँ तक लुटा जायेंगे,

मूवी: शहीद गायक: मुहम्मद रफ़ी संगीतकार: प्रेम धवन गीतकार: प्रेम धवन जलते भी गए, कहते भी गए, आज़ादी के परवाने जीना तो उसी का जीना है, जो मरना वतन पे जाने ऐ वतन, ऐ वतन, हमको तेरी क़सम, तेरी राहों में जाँ तक लुटा जायेंगे, फूल क्या चीज़ है तेरे क़दमों पे हम, भेंट अपने सरों की चढ़ा जायेंगे. ऐ वतन, ऐ वतन, हमको तेरी क़सम, तेरी राहों में जाँ तक लुटा जायेंगे, ऐ वतन, ऐ वतन...... कोई पंजाब से, कोई महाराष्ट्र से, कोई यूपी से है, कोई बंगाल से, कोई पंजाब से, कोई महाराष्ट्र से, कोई यूपी से है, कोई बंगाल से, तेरी पूजा की थाली में लायें हैं हम, फूल हर रंग के, आज हर डाल से, नाम कुछ भी सही, पर लगन एक है, जोत से जोत दिल की जगा जायेंगे, ऐ वतन, ऐ वतन, हमको तेरी क़सम, तेरी राहों में जाँ तक लुटा जायेंगे, ऐ वतन, ऐ वतन...... तेरी जानिब उठी जो कहर की नज़र, उस नज़र को झुका के ही दम लेंगे हम, तेरी जानिब उठी जो कहर की नज़र, उस नज़र को झुका के ही दम लेंगे हम, तेरी धरती पे है जो, क़दम गैर का, उस क़दम का निशां तक मिटा देंगे हम, उस क़दम का निशां तक मिटा देंगे हम, जो भी दीवार आएगी अब सामने, ठोकरों से उसे हम गिरा जायेंगे, ऐ वतन, ऐ वतन,...

दूध में दरार पड़ गई - अटल बिहारी वाजपेयी

दूध में दरार पड़ गई खून क्यों सफेद हो गया भेद में अभेद खो गया बँट गये शहीद, गीत कट गए कलेजे में कटार गड़ गई दूध में दरार पड़ गई खेतों में बारूदी गंध, टूट गये नानक के छंद सतलुज सहम उठी, व्यथित सी वितस्ता है। वसंत से बहार झड़ गई दूध में दरार पड़ गई। अपनी ही छाया से बैर, गले लगने लगे हैं गैर, ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता। बात बनाएँ, बिगड़ गई। दूध में दरार पड़ गई। ८ दिसंबर २००१

कदम मिलाकर चलना होगा - अटल बिहारी वाजपेयी

कदम मिलाकर चलना होगा बाधाएँ आती हैं आएँ घिरें प्रलय की घोर घटाएँ पावों के नीचे अंगारे सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ निज हाथों में हँसते-हँसते आग लगाकर जलना होगा कदम मिलाकर चलना होगा हास्य-रुदन में, तूफानों में अगर असंख्यक बलिदानों में उद्यानों में, वीरानों में अपमानों में, सम्मानों में उन्नत मस्तक, उभरा सीना पीड़ाओं में पलना होगा कदम मिलाकर चलना होगा उजियारे में, अंधकार में कल कहार में, बीच धार में घोर घृणा में, पूत प्यार में क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में जीवन के शत-शत आकर्षक अरमानों को ढलना होगा कदम मिलाकर चलना होगा सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ प्रगति चिरंतन कैसा इति अब सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ असफल, सफल समान मनोरथ सब कुछ देकर कुछ न माँगते पावस बनकर ढ़लना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा। कुछ काँटों से सज्जित जीवन, प्रखर प्यार से वंचित यौवन, नीरवता से मुखरित मधुबन, परहित अर्पित अपना तन-मन, जीवन को शत-शत आहुति में, जलना होगा, गलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा। ८ दिसंबर २००१

मौत की उम्र क्या है? दो पल भी नहीं,ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

मौत से ठन गई ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। मौत की उम्र क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आजमा। मौत से बेख़बर, जिन्दगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर। बात ऐसी नहीं कि कोई गम ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं। प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न अपनों से बाकी हैं कोई गिला। हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आँधियों में जलाए हैं बुझते दिये। आज झकझोरता तेज़ तूफान है, नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है। पार पाने का कायम मगर हौसला, देख तेवर तूफाँ का, तेवरी तन गई। मौत से ठन गई। ८ दिसंबर २००१

मेरे प्रभु! मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना गैरों को गले न लगा सकूँ इतनी रुखाई कभी मत देना।

ऊंचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है।    जमती है सिर्फ बर्फ, जो कफन की तरह सफेद और मौत की तरह ठंडी होती है। खेलती,‍ खिलखिलाती नदी जिसका रूप धारण कर अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।   ऐसी ऊंचाई, जिसका परस, पानी को पत्थर कर दे, ऐसी ऊंचाई जिसका दरस हीन भाव भर दे, अभिनंदन की अधिकारी है, आरोहियों के लिए आमंत्रण है, उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं, किंतु कोई गौरैया वहाँ नीड नहीं बना सकती, न कोई थका-माँदा बटोही, उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।   सच्चाई यह है कि  केवल ऊँचाई ही काफी नहीं होती, सबसे अलग-थलग  परिवेश से पृथक, अपनों से कटा-बँटा, शून्य में अकेला खड़ा होना, पहाड़ की महानता नहीं, मजबूरी है। ऊँचाई और गहराई में आकाश-पाताल की दूरी है।   जो‍ जितना ऊँचा, उतना ही एकाकी होता है, हर भार को स्वयं ही ढोता है, चेहरे पर मुस्कानें चिपका, मन ही मन रोता है।   जरूरी यह है कि  ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो, जिससे मनुष्य  ठूँठ-सा खड़ा न रहे, औरों से घुले-मिले, किसी को साथ ले, किसी के संग चले।   भीड़ में खो जाना, यादों मे...